Dussehra जो 75 दिनों तक चलता है

दशहरा (Dussehra) शब्द सुनते ही याद आता है दस दिनों तक चलने वाला पर्व। जिसे देश में  “बुराई पर अच्छाई कि जीत” के प्रतिक रूप में मनाया जाता है। कहीं भगवान श्री राम की पूजा कि जाती है तो कहीं मां दुर्गा कि, लेकिन देश के विभिन्न कोणे में यह पर्व दस दिनों तक ही चलता हैं। सिवाय छत्तीसगढ़ के बस्तर जिलें में मनाया जाने वाला दशहरा को छोड़कर। इसे बस्तर दशहरा के नाम से जाना जाता है। जो 75 दिनों तक चलता है। यहां बस्तर की अराध्य देवी मां दंतेश्र्वरी की पूजा-अर्चना कि जाती है ।

पाट जात्रा के रस्म से होती है शुरू

बस्तर दशहरे की शुरुआत सावन के महीने में पड़ने वाली हरियाली अमावस्या से होती है । इस दिन रथ बनाने के लिए जंगल से पहली लकड़ी लाई जाती है। इस रस्म को पाट जात्रा कहा जाता है। यह त्योहार दशहरा के बाद तक चलता है और मुरिया दरबार की रस्म के साथ समाप्त होता है। मुरिया दरबार की रस्म में बस्तर के महाराज दरबार लगाकार जनता की समस्याएं सुनते हैं। यह त्योहार देश का सबसे ज्यादा दिनों तक मनाया जाने वाला त्योहार है।  75 दिनों की इस लंबी अवधि में मुख्य रूप से काछनगादी, पाट जात्रा, जोगी बिठाई, मावली जात्रा, भीतर रैनी, बाहर रैनी तथा मुरिया दरबार मुख्य रस्में होती हैं।

Dussehra Image

काछनदेवी कि अनुमती

माहरा कबिले की ईष्टदेवी काछनदेवी से अमावस्या के दिन आशीर्वाद और अनुमति लेकर दशहरा उत्सव प्रारंभ किया जाता है। इसे काछनगादी पूजा विधान कहते है। इसमें मिरगान जाति की बालिका को काछनदेवी  की सवारी आती है जो बेल कांटों से तैयार झूले पर बैठकर रथ परिचालन व पर्व की अनुमति देती है। इसके दूसरे दिन हलबा समुदाय का एक युवक सीरासार में 9 दिनों की निराहार योग साधना में बैठकर लोक कल्याण की कामना करता है।

रथ होता है खास आकर्षण

बस्तर दशहरे का खास आकर्षण होता है आदिवासियों द्वारा लकड़ियों से तैयार किया गया भव्य रथ। लकड़ी से बना लगभग 20 फुट चौड़ा, 40 फुट लंबा, 50 फुट ऊंचा रथ, जिसे आदिवासी अपने प्राचीन परंपरागत औजारों से बनाते हैं। इस रथ का वजन 5 टन से अधिक है। कहा जाता है कि बस्तर में दशहरा त्योहार की शुरुआत 1408 में हुई थी। जिसे फूलों से सजाया जाता है। दशहरे में शामिल होने बस्तर क्षेत्र के कोने-कोने से आदिवासी पहुंचते हैं और रथ को खींचते हैं। फूल रथ  चार चक्कों का तथा विजय रथ आठ चक्कों का बनाया जाता है। रथ पर मां दंतेश्वरी का छत्र रखा जाता है, राजशाही के समय में बस्तर के महाराज भी रथ में सवार होते थे। जोगी बिठाई के अगले दिन से ही फूल रथ का चलना शुरू हो जाता है। दशहरे के दिन भीतर रैनी और एकादशी के दिन बाहर रैनी की रस्म निभाई जाती है।

600 साल से मनाते आ रहे पर्व

बस्तर के लोग 600 साल से यह पर्व मनाते आ रहे हैं। यह संगम है बस्तर की संस्कृति, राजशाही, सभ्यता और आदिवासियों की आपसी सद्भावना का। आदिवासियों की अभूतपूर्व भागीदारी की वजह से भी इस पर्व को जाना जाता है। परगनिया, मांझी, मुकद्दम, कोटवार व ग्रामीण दशहरे की तैयारियों में पहले से ही जुट जाते हैं।  अब मुरिया दरबार में महाराज के साथ-साथ राज्य के सीएम भी लोगों की समस्याएं सुनते हैं। मुरिया दरबार के साथ ही बस्तर दशहरे का समापन होता है।

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Image Source: Internet

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