WORLD FAMOUS DUSSEHRA: कुल्लु दशहरा

भारत और हिंदुओं का सबसे प्रसिद्ध त्यौहार दशहरा जो पूरे देश में काफी धूमधाम से मनाय जाता है। असत्य पर सत्य की जीत का विजयपर्व माना जाने वाला यह पर्व अब सिर्फ भारत में ही नही बल्कि दूसरे देश में भी काफी फेमस है। तभी तो विदेशी पर्यटक दशहरा में हिंदुस्तान खिंचे चले आते हैं। आज हम आपको बताएंगे ऐसे ही दशहरा के बारें में जो जहां देश से ही नही बल्कि विदेशी पर्यटक में इसमें शामिल होते हैं ।

कुल्लु दशहरा

कुल्लु हिमाचल प्रदेश में बसा एक अत्यंत मनोरम जगह है। यहां मनाया जाने वाला दशहरा को कुल्लु दशहरा के नाम से जाना जाता है। यहां विश्वभर से लोग इस मेले में शामिल होते हैं। खास बात ये है कि यहां दशहरा ना तो भगवान श्री राम की पूजा होती है और ना ही मां दूर्गा की, बल्कि यहां के लोग दशहरा में अपने कुल देवता की पूजा करते हैं। अपने कुल देवता की झांकी निकालते हैं।     

जब पूरे देश में दशहरा पर्व का समापन हो रहा होता है तब कुल्लू में कुल्लू दशहरा की शुरुआत होती है। चंद्रोदय के दसवें दिन यानि की विजयदशमी के दिन से इसकी शुरुआत होती है और यह उत्सव सात दिनों तक जारी रहता है। कुल्लू दशहरा की शुरुआत के पीछे राजकिय कारण माना जाता हैं। इस समय अंतर्राष्ट्रीय लोक उत्सव भी मनाया जाता है।

कुल्लू दशहरा की शुरुआत 1637 ईस्वी से हुई जब जगत सिंह यहां के राजा थें। एक दिन उन्हें पता चला कि टिपरी गांव के किसान दुर्गा दत्त के पास बहुमूल्य मोती हैं। राजा उन मोतियों को प्राप्त करना चाहता था। दुर्गा दत्त ने राजा को समझाने की कोशिश की कि उसके पास कोई मोती नहीं है पर राजा ने एक न सुनी। दुर्गा दत्त इतना डर गया कि उसने अपने परिवार और घर को जला डाला और राजा की क्रूरता के लिए उसे अभिशापित किया। उसके अभिशाप से राजा को कोढ़ हो गया।

कुल्लु दशहरा

फुहारी बाबा के नाम से प्रसिद्ध कृष्ण दास ने राजा को सलाह दी कि किसान के अभिशाप से बचने के लिए वो प्रभु रघुनाथजी की प्रतिमा स्थापित करें। प्रतिमा स्थापित करने के बाद राजा ने कुछ दिनों के लिए प्रतिमा के चरणामृत का सेवन किया और समय के साथ कोढ़ से मुक्त हो गया। उसने अपना साम्राज्य और अपना जीवन प्रभु में लीन कर दिया और तब से पूरे उमंग के साथ दशहरा मनाने की प्रथा शुरु हुई। इसलिए रघुनाथजी के सम्मान में यज्ञ कराने के लिए राजा सभी 365 देवी देवताओं को धालपुर घाटी में आमंत्रित करता है।

दशहरा के प्रथम दिन मनाली की देवी हडिम्बा कुल्लू आती हैं। वह कुल्लू के राज परिवार की देवी हैं। उनके कुल्लू आगमन पर प्रवेश द्वार पर राज छडी उनका स्वागत करती है और उन्हें महल तक ले जाती है। राज परिवार को आशीर्वाद देकर वो धालपुर आती हैं।

हडिम्बा के साथ ही रघुनाथजी की प्रतिमा को खूबसूरती से सजाए गए रथ में बैठाया जाता है। इसके बाद वे माता भेखली के संकेत का इंतज़ार करते हैं, जिसे पहाड़ी के ऊपर से दिया जाता है। इस रथ को अपने वास्तविक स्थान से रस्सियों के सहारे खींचकर दूसरी जगह पर ले जाया जाता है जहां अगले छह दिनों तक यह रथ रहता है। सौ से भी अधिक देवी देवताओं को रंग- बिरंगी पालकियों में बैठाकर जुलूस निकाला जाता है।

उत्सव के छठे दिन सभी देवताओं को एकसाथ एकत्र किया जाता है जिसे मोहल्ला कहते हैं। रघुनाथजी के आस-पास सजी-धजी पालकियों में देवताओं के इस जमघट का मंजर अनोखा होता है और यह नजारा बेहद दुर्लभ प्रतीत होता है। अंतिम दिन रथ को ब्यास नदी के किनारे लाया जाता है जहां लंकादाह को दर्शाने के लिए झाड़ियों के कांटों को जलाया जाता है। इसके बाद रथ को अपने वास्तविक स्थान पर लाया जाता है। रघनाथजी को रघुनाथपुर के मंदिर में वापस ले जाते हैं। और इसके साथ ही उमंग और उत्साह से परिपूर्ण विश्व प्रसिद्ध दशहरे का समापन हो जाता है।

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