दिशाओं के देव

हिन्दू शास्त्र के अनुसार दिशाएं 8 होती है। इनके अलावा 2 दिशाएं आकाश और पाताल को मानी‍ गई है। ये दिशाएं मनुष्य का जीवन और भविष्य तय करती है। हम चार दिशाओं पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण से  अच्छी तरह से परिचित हैं परंतु वास्तु में भूखंड को आठ दिशाओं में बांटा जाता है, जिनमें उत्तर-पूर्व के बीच का कोना ईशान कोण, दक्षिण-पूर्व के बीच का कोना अग्नेय कोण, उत्तर-पश्चिम को वायव्य कोण और दक्षिण-पश्चिम को नैर्ऋत्य कोण कहते हैं। इनमें प्रत्येक दिशा का अपना अलग तत्व माना गया है। जिसमें पूर्व दिशा अग्नि तत्व का कारक है, पश्चिम दिशा वायु तत्व का कारक, उत्तर जल तत्व का और दक्षिण दिशा भूमि तत्व का कारक है। इसी प्रकार ईशान कोण जल तत्व का कारक, आग्नेय कोण अग्नि तत्व, वायव्य दिशा वायु तत्व और नैर्ऋत्य कोण भूमि तत्व का कारक है।

हमारे पौराणिक शास्त्रों के अनुसार इस प्रत्येक दिशा का एक देवता है जिसे ‘दिग्पाल’ कहा गया है अर्थात् दिशाओं के पालनहार, दिशाओं की रक्षा करने वाले।

दिशाओं के स्वामी

सूर्य पूर्व दिशा का स्वामी है, यही वजह है कि पूर्व दिशा ज्ञान, प्रकाश और आध्यात्म की प्राप्ति में व्यक्ति की मदद करती है|

पश्चिम दिशा के देव वरूण हैं, वरूण देव को वर्षा के देवता कहा जाता है। इनकी कृपा से वर्षा होती है, जिससे हमारे जीवन में खुशियाँ आती है।

उत्तर दिशा को समृद्धि का दिशा माना जाता है, क्योंकि इस दिशा के देवता हैं कुबेर जो हमें धन-धान्य से संपन्न करते हैं।

दक्षिण दिशा के देव हैं यम, यानि मृत्यु के देवता, जो हमें धार्मिक कार्यों की ओर प्रवृत्त करते हैं और हमारी सारी बुराइयों का नाश करते हैं।

उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान कोण), इस दिशा में बुद्धि के देवता निवास करते हैं, जो हमें ज्ञान प्रदान करते हैं।

दक्षिण-पूर्व दिशा (आग्नेय दिशा)  इस दिशा में अग्नि देव निवास करते हैं, जो हमें अच्छा व्यक्तित्व प्रदान करते हैं।

दक्षिण-पश्चिम दिशा (नैऋत्य दिशा) या नैऋत्य कोण को वास्तु में मृत्यु का स्थान बताया गया है, यहां पिशाचों का वास होता है|   इस दिशा में विराजमान देवता हमारे शत्रुओं का नाश कर हमें अभयदान प्रदान करते हैं।

उत्तर-पश्चिम दिशा (वायव्य दिशा)  में वायु देवता निवास करते हैं, जो हमें जीवनरक्षक प्राणवायु प्रदान करते हैं।

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